भक्तों के चरित्र का स्मरण कुछ उदाहरण जिनके चरित्र को जानकर भी हम अपनी मृत्यु को मंगलमय बेला बना सकते हैं। महाराज दशरथ जो कि श्री राम जी से स...
भक्तों के चरित्र का स्मरण
महाराज दशरथ जो कि श्री राम जी से सच्चा स्नेह रखते थे, हर क्षण राम सुमिरन में व्यतीत करते है, तभी तो उन्हीं रामजी का सुमिरन करते हुए उन्होंने अपना देह-त्याग किया और इहलोक व परलोक सुधार लिया।
पैदा हुए की मृत्यु जरूर होगी और मरें हुए का जन्म जरूर होगा, लेकिन इस जन्म-मरण के चक्र का निवारण करना है, तो भीष्म पितामह की तरह इस देह का त्याग करके हम सच्ची मुक्ति पा सकते हैं।
युद्धभूमि में, तीरों से बीँधा हुआ, छलनी जैसे शरीर वाले भीष्म पितामह जो कि असहनीय पीड़ा से व्याकुल हो रहे है, फिर भी अन्तिम क्षणों में परमपिता परमेश्वर का धन्यवाद करते है और उनसे अनुग्रह करते है कि हे ज्योति स्वरूप परब्रह्म आप जो कि केवल अपने भक्तों की इच्छाएं पूर्ण करने के लिए अवतार धारण करते है, जिस तरह से आप मेरे सन्मुख खड़े है, कृपाकर इस तरह से खड़े रहे, जिससे कि मेरे प्राणों के निकलते समय में भी मेरा ध्यान आपके पावन चरण कमलों में लगा रहे, आपने जो मुझ पर महती कृपा की कि अन्त समय में मैं आपको निहार कर अपने श्वास छोड़ रहा हूं|
वरना तो, मृत्यु की घोर पीड़ा में जीव कुछ भी समझ नहीं पाता, केवल और केवल आपकी कृपा से ही जीव अन्त समय में भी अपनी बुद्धि को केवल आपके चरणों में लगा कर ही मुक्ति पा सकता है।
इस प्रकार भीष्म जी ने ज्योतिस्वरूप का ध्यान हृदय में रखकर श्यामसुन्दर को प्रणाम करके अपनी आंखों को बन्द कर लिया और योगाभ्यास के साथ अपना तन छोड़कर बैकुण्ठ वास पाया,
अर्थात् जो जीव अन्त समय में श्री हरि के शरणागत होकर, सांसारिक रिश्ते-नाते भुलाकर, भौतिक साधनों का मोह त्यागकर केवल भगवान में ही अपनी बुद्धि लगाकर देह का त्याग करते है, उन्हीं की मृत्यु सफल है और वही जीवन-मरण की मुक्ति पाकर एक मुक्तात्मा बन जाता है। जीव-2 ना रहकर शिव बन जाता है।
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